ग्राम प्रधान है या ……………अपराधिक मानसिकता की जननी ?

चुनाव अधिकारी के समक्ष झूठा हलफनामा, फर्जी पट्टे, ग्राम सभा की जमीनों पर अवैध अतिक्रमण


विशेष संवाददाता, लम्बा सफर, गल्जवाड़ी/ देहरादून/उत्तराखण्ड। देहरादून की सुंदर वादियों में बसा ग्राम गल्जवाड़ी अक्सर ग्राम प्रधान के कारनामों के कारण चर्चाा में बना रहता है। 2008 में अनप़ढ़ का हलफनामा चुनाव आयोग को देना, 2014 में भी यही हलफनामा और यही नहीं घोटालों में पकड़े जाने पर 2016 में पुलिस को भी यही बयान देना कि मैं अनपढ़ हूॅ। और फिर अचानक ही 2018 के चुनाव में हाई स्कूल का प्रमाण पत्र कहां से आ गया, जांच का विषय है।
आपको बताते चलें कि राजधानी देहरादून में ग्राम सभा गल्जवाड़ी में लगातार तीन योजनाओं से ग्राम प्रधान लीला शर्मा है। आलम ये कि डंडे के बल पर प्रधानी करती है। वोटों का जाल इस तरह बिछाया है कि ताउम्र प्रधान बनी रहे। तमाम ग्राम सभा की जमीनें भूमाफियाओं को बेच डाली। यही नहीं अवैध रूप से पट्टों की अदला-बदली पटवारी, कानूनगो, तहससीलदार के साथ मिलकर कर डाली। जमीनों के नंबरों को अदला-बदली करने का खेल पटवारी मि. जोशी और भूमाफियाओं से इसने सीखा। यही वजह है कि ग्राम पंचायत की भूमि आज बची ही नहीं। तकरीबन 100 से 150 बीघा ग्राम पंचायत की भूमि पिछले 14 वर्षों में खुर्द-बुर्द की जा चुकी है।
आपको बताते चलें कि ग्राम प्रधान 2016 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते 81 दिन जेल की हवा भी खा चुकी है। मामला अभी माननीय न्यायालय में विचाराधीन है। बावजूद इसके जेल से आने के बाद इनके हौंसले और बुलन्द हैं।
एक बात और काबिलेगौर है कि 2016 में मनरेगा में रिकवरी के आदेश हुए थे। जिसके खिलाफ लीला हाई कोर्ट चली गई थी। न्यायालय की लचर कार्रवाई, लोअर कोर्ट ने रिकवरी के आदेश दिये, किंतु माननीय उच्च न्यायालय ने रिकवरी के आदेशों पर स्थगन आदेश दे दिये, जो कि अभी तक जारी हैं।
हमारा सवाल उत्तराखण्ड के देहरादून जिला प्रशासन से है कि जब 2017 में रिकवरी के आदेश हो गये, तब 2019 में चुनाव कैसे लड़ने दिया गया ?
प्ंचायती राज अधिनियम धारा 8 का 4. मूल अधिनियम की धारा 8 में ।
(थ)2019 में पंचायती राज अधिनयम में संशोधन किया गया था कि प्रधान प्रत्याशी किसी मान्यता प्रााप्त संस्था/बोर्ड से हाई स्कूल अथवा समकक्ष उत्तीर्ण।
ध – उसका किसी सरकारी/पंचायती राज विभाग की भूमि पर अनाधिकृत कब्जा ।
न – उसने सरकारी धन का गबन किया हो या उसके विरूद्ध सरकारी धन की वसूली चल रही हो या उस पर शासकीय धन का बकाया हो।
अब ग्राम प्रधान लीला शर्मा तो इन तीनों आरोंपों में फिट बैठती है। कानून तो यही कहता है कि उनके खिलाफ जांच कमेटी गठित हो और तुरंत प्रभाव से जिलाधिकारी महोदय को उनका बस्ता रखवा लेना चाहिए, ताकि जांच निष्पक्ष जांच हो सके।

प्रधान स्वंय ग्राम सभा की जमीन पर विराजमान है, तब चुनाव कैसे लड़ने दिया गया ?
इन्हीं सब विषयों को लेकर हम भी खटखटाने जा रहे हैं, कानून के दरवाजे।
क्या कहता है हमारा कानून ऐसे भ्रष्ट लोगों के लिए ?

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