डीयू में एसओएल द्वारा आयोजित किया गया “देश देवो भव” कार्यक्रम सरकार को टैक्स देने की तरह देश की सेवा करना भी है आवश्यक कार्य: श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी

नई दिल्ली, 24 सितंबर दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग’ (एसओएल) और ‘चतुर्मास्य सेवा समिति’, संस्कृति मंत्रालय (भारत सरकार) तथा दिल्ली पर्यटन (एनसीटी दिल्ली सरकार) के सहयोग से “देश देवो भव” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी ने अपने संबोधन में कहा कि देश देव की पूजा करना सबके लिए आवश्यक है। जैसे सरकार को टैक्स देना आवश्यक कार्य है वैसे ही देश की सेवा करना भी आवश्यक कार्य है। डीयू के खेल परिसर स्थित मल्टीपर्प्ज हाल में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की। इस अवसर पर लोकसभा सांसद तेजस्वी सूर्या बतौर विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी ने अपने संबोधन में कहा कि जीवन बिताने के लिये हम जो वृत्ति अपनाते हैं उससे भगवान की पूजा होती है। स्वामीजी ने कहा कि भगवान सिर्फ मंदिर में ही रहने वाले नहीं हैं, वो तो सबके हृदय में रहते हैं। हमारी वृत्ति का प्रथम और मुख्य लक्ष्य भगवान की पूजा होनी चाहिए, धन कमाना द्वितीय लक्ष्य हो सकता है। इस तरह से हम ऐसा जीवन बिताएं जिसमें “देश देव” के अच्छे का भाव हो। इस अवसर पर उन्होंने सभी को एक प्रतिज्ञा भी दिलवाई जिसमें “मैं हमेशा अपने माता-पिता, गुरु, बड़ों का आदर करूँगा। मैं हफ्ते में कम से कम एक दिन अपने परिवार के साथ बैठकर खाना खाऊँगा। मैं भारतीय जीवन शैली से हमें मिले ऊंचे मूल्यों का पालन करूँगा, मैं किसी भी बुरी आदत से मुक्त हूँ। भारत के नागरिक के तौर पर, मैं संविधान से मिले मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों का बराबर पालन करूँगा। मैं हमेशा देश का सम्मान करूँगा। मैं एक नागरिक के तौर पर भारत को दुनिया का एक महान राष्ट्र बनाने के लिए लगातार कोशिश करूंगा।” की शपथ दिलाई गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि उपनिषदों ने हमें “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्यदेवो भव और अतिथि देवो भव का संदेश तो दिया लेकिन इसमें “देश देवो भव” रह गया। शायद उस समय इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई होगी। कुलपति ने कहा कि भारत 800 वर्ष तक गुलाम रहा है। शायद इस एक विचार की कमी ने सदियों तक उसकी कीमत चुकाई है। उन्होंने कहा कि “देश देवो भव” का मतलब राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण है। भारत और भारत के समाज में इसकी कमी बहुत खलती है। इस पर काम करने की जरूरत है और ये काम विश्वविद्यालयों, प्राध्यापकों और शैक्षणिक संस्थाओं का है। कुलपति ने कहा कि “देश देवो भव” का भाव बहुत आवश्यक है। अपने देश से प्यार करना और उसे आगे बढ़ाना हम सबका कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम सबकी प्रयास करने होंगे और उस प्रयास के मूल में यह भाव आवश्यक है।
लोकसभा सांसद तेजस्वी सूर्या ने अपने संबोधन में कहा कि विकसित भारत के लिए “देश देवो भव” का भाव बहुत जरूरी है। उन्होंने उपस्थित विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि शायद मेरी और आपकी पीढ़ी विकसित भारत के फल को भोगने वाली पहली पीढ़ी होगी। विकसित भारत के संकल्प को पूर्ण करने के लिए उन्होंने विद्यार्थियों को संदेश दिया कि बड़े सपने देखें, भारत छोटे सपनों का देश नहीं है। कार्यक्रम के अंत में सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी दी गई।
कार्यक्रम के आरंभ में अपने स्वागत भाषण में सीओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो ने बताया कि हमारी विरासत, संस्कृति, भारत के लोगों और एक मजबूत भारत के मूल्यों पर चर्चा करने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि एसओएल द्वारा “देश देवो भव” थीम पर पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था जिसमें 2000 विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। इनमें से 52 विद्यार्थियों को क्रमशः 21,000, 11,000 और 5,000 रुपये के नकद पुरस्कार प्रदान किए गए। इस अवसर पर डीन ऑफ कॉलेज प्रो. बलराम पाणी, दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी, सीओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो, डॉ अभिषेक टंडन और प्रो. अजय जैसवाल सहित डीयू व एसओएल के अनेकों अधिकारी तथा एसओएल के करीब 5 हजार विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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